Wednesday , 28 October 2026

चिपको आंदोलन : 45 साल पूरे होने को गूगल ने डूडल बनाकर किया सेलिब्रेट

चिपको आंदोलन की 45वीं वर्षगांठ पर गूगल ने डूडल बनाकर उसे सेलिब्रेट किया है। डूडल सवाभू कोहली और विपल्व सिंह ने बनाया है। यह चित्र दुनियाभर में फैले पर्यावरण संरक्षणवादियों की बहादुरी और अटलता को दर्शाता है। गूगल ने डूडल के जरिए उनकी इन कोशिशों के लिए धन्यवाद भी कहा है। गूगल ने अपने संदेश में लिखा, ‘सामाजिक बदलाव में विरोध के अधिकार ने एक अनमोल और शक्तिशाली भूमिका निभाई है. चिपको आंदोलन के प्रति अपना सम्मान दिखाने के लिए आप कुछ समय निकालकर किसी वृक्ष को गले लगाएं.’

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चिपको आंदोलन की शुरुआत 1970 के दशक में पर्यावरण संरक्षण के लिए हुई थी। चिपको आंदोलन ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को हिमालय में वनों की कटाई पर 15 साल के लिए रोक लगाने, 1980 का वन कानून बनाने के लिए बाध्य किया था, और देश में बाकायदा पर्यावरण मंत्रालय बना था। गांधीवादी कार्यकर्ता और पद्मभूषण चंडी प्रसाद भट्ट ने उत्तराखंड के चमोली जिले के गोपेश्वर गांव में 1964 में ‘दशोली ग्राम स्वराज्य संघ’ की स्थापना की थी, जिसके तहत ही मार्च 1973 में चिपको आंदोलन शुरू हुआ। महिलाओं ने इसमें खास भूमिका निभाई थी, और वे वन विभाग के ठेकेदारों से वनों को बचाने के लिए पेड़ों से चिपक जाती थीं।

 

 

 

चिपको आंदलोन की वास्तविक शुरुआत 18वीं शताब्दी में राजस्थान से हुई, जब बड़ी संख्या में बिश्नोई समाज के लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे लिपट गए। इन पेड़ों को जोधपुर के महाराजा के आदेश पर काटा जा रहा था, लेकिन आंदोलन शुरू होने के तुरंत बाद ही उन्होंने यह आदेश जारी किया कि सभी बिश्नोई गांवों में पेड़ों का ना काटा जाए।

 

 

 

आधुनिक भारत में चिपको आंदोलन उत्तर प्रदेश के ऊपरी अलकनंदा घाटी पर स्थित मांडल गांव से अप्रैल 1973 में आरंभ हुआ था और जल्द ही यह राज्य के दूसरे हिमालयी जिलों में भी फैल गया. चिपको आंदोलन के पीछे सरकार का वह आदेश था, जिसके मुताबिक खेल का सामान बनाने वाली कंपनी को जंगल इलाके में जमीन देने का फैसला किया गया था। इससे गुस्साए गांववालों ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उसे चारों ओर से घेर लिया। चिपको आंदोलन का नेतृत्व स्थानीय महिलाओं ने किया, जिसे बाद में चंडी प्रसाद भट्ट और उनके एनजीओ ‘दशोली ग्राम स्वराज्य संघ’ ने आगे बढ़ाया।

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