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अंबाला का 1857 शहीदी स्मारक आज होगा देश को समर्पित, 22 गैलरी और 65 मीटर ऊंचा टावर बनेगा आकर्षण

अंबाला का 1857 शहीदी स्मारक आज होगा देश को समर्पित, 22 गैलरी और 65 मीटर ऊंचा टावर बनेगा आकर्षण

हरियाणा के अंबाला में 1857 की क्रांति को समर्पित भव्य शहीदी स्मारक का गुरुवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह लोकार्पण करेंगे। करीब 800 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 10 साल में तैयार इस स्मारक को देश के प्रमुख ऐतिहासिक और आधुनिक तकनीक से लैस म्यूजियम के रूप में विकसित किया गया है। यहां 22 गैलरी, 65 मीटर ऊंचा मेमोरियल टावर, स्काई कैफे, 360 डिग्री इमर्सिव प्रोजेक्शन और अत्याधुनिक लाइट एंड साउंड शो जैसे आकर्षण देखने को मिलेंगे।

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हालांकि, लोकार्पण के बाद भी आम लोगों को यहां घूमने के लिए कुछ दिन इंतजार करना पड़ सकता है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, स्मारक को दिवाली के बाद जनता के लिए खोले जाने की तैयारी है। प्रवेश के लिए टिकट भी रखा जाएगा। इसकी कीमत 250 रुपये तक प्रस्तावित बताई जा रही है। अंतिम टिकट दर और आम लोगों के प्रवेश की तारीख मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी घोषित करेंगे। वह म्यूजियम संचालन कमेटी के चेयरमैन भी हैं।

स्मारक को पूरी तरह देखने के लिए लगभग पांच घंटे का समय निकालना होगा। इसमें शाम के लाइट एंड साउंड शो का समय शामिल नहीं है। यह शो रोजाना आयोजित करने की योजना है। इसके लिए विजिटर को कॉम्बो पैक की सुविधा भी मिल सकती है।

स्मारक के डायरेक्टर डॉ. कुलदीप सैनी का दावा है कि निर्माण लागत, निर्मित क्षेत्र और थीम के आधार पर यह देश का सबसे बड़ा म्यूजियम है। इसकी कई गैलरियां अंतरराष्ट्रीय म्यूजियम की आधुनिक तकनीक से प्रेरित हैं। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक स्मारक की सात बड़ी खासियतें।

1. 65 मीटर ऊंचा टावर और 2 हजार दर्शकों की क्षमता वाला थिएटर

करीब 22 एकड़ में फैले परिसर में प्रवेश करते ही 65 मीटर ऊंचा मेमोरियल टावर दिखाई देता है। इसकी 13वीं मंजिल तक पहुंचने के लिए हाई-स्पीड लिफ्ट लगाई गई है। यहां इमर्सिव प्रोजेक्शन शो के जरिए दर्शकों को इतिहास से जुड़ा एक अलग अनुभव देने की व्यवस्था है।

म्यूजियम का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा डिजिटल तकनीक पर आधारित बताया गया है। लेजर शो, 3D ग्राफिक्स और वर्चुअल रियलिटी (VR) के माध्यम से 1857 की घटनाओं को प्रस्तुत किया जाएगा।

टावर के सामने 2,000 दर्शकों की क्षमता वाला ओपन एयर थिएटर भी बनाया गया है। यहां खुले आसमान के नीचे लाइट, साउंड और प्रोजेक्शन के जरिए क्रांति की कहानी दिखाई जाएगी। टावर के सबसे ऊपरी हिस्से में स्काई कैफे भी बनाया गया है।

2. पानी की स्क्रीन पर दिखेगी क्रांति, टावर पर होगा प्रोजेक्शन शो

स्मारक का वाटर शो भी खास आकर्षण होगा। इसमें पानी के फव्वारों की मदद से स्क्रीन तैयार की जाएगी। इस स्क्रीन पर चलने वाली तस्वीरों और वीडियो को 65 मीटर ऊंचे टावर पर भी प्रदर्शित किया जाएगा।

प्रोजेक्शन और ग्राफिक्स के जरिए ऐसे दृश्य तैयार किए जाएंगे, जिनमें क्रांति से जुड़े प्रसंग जीवंत नजर आएंगे। म्यूजियम की दीवारों पर प्रोजेक्शन मैपिंग और टावर पर लाइट एंड साउंड शो भी आयोजित किया जाएगा।

इस व्यवस्था में इस्तेमाल होने वाले एक प्रोजेक्टर की कीमत करीब 5 करोड़ रुपये बताई गई है।

3. तीन मंजिलों में 22 गैलरी, 360 डिग्री तकनीक से दिखेगा इतिहास

मुख्य म्यूजियम तीन मंजिलों में तैयार किया गया है। इसमें 22 गैलरियां हैं, जहां 1857 की क्रांति से जुड़ी घटनाओं को अलग-अलग विषयों के माध्यम से क्रमवार दिखाया जाएगा।

‘भारत में युद्ध’ नाम की गैलरी में 360 डिग्री इमर्सिव प्रोजेक्शन की व्यवस्था है। इसमें दर्शकों के चारों तरफ ऐतिहासिक दृश्य दिखाई देंगे। इसके अलावा डिजिटल किताब भी आकर्षण का हिस्सा है, जिसके पन्ने हाथ के इशारों से पलटे जा सकेंगे।

इस तरह दर्शक केवल तस्वीरें और जानकारियां देखने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि तकनीक के माध्यम से इतिहास को महसूस करने का अनुभव भी प्राप्त कर सकेंगे।

4. हरियाणा की लोककला और ‘मूक वृक्ष’ के जरिए शहीदों को श्रद्धांजलि

म्यूजियम में आर्ट एंड क्राफ्ट से जुड़ा काम हरियाणा के स्थानीय कारीगरों ने किया है। यहां टेराकोटा, जूट और पारंपरिक फुलकारी जैसी कलाओं का इस्तेमाल किया गया है।

श्रद्धांजलि गैलरी में ‘मूक वृक्ष’ नाम से एक विशेष कलाकृति बनाई गई है। इसके जरिए अंग्रेजी शासन के दौरान क्रांतिकारियों को पेड़ों पर फांसी दिए जाने की घटनाओं को प्रतीकात्मक रूप में दर्शाया गया है।

इस कलाकृति को छूने पर रोशनी निकलने और पेड़ की शाखाओं के प्रकाशित होने का प्रभाव तैयार किया गया है। यह प्रस्तुति शहीदों के बलिदान को याद करने का एक अनूठा माध्यम बनेगी।

5. क्या मेरठ से करीब 9 घंटे पहले अंबाला में उठी थी क्रांति की चिंगारी?

स्मारक का एक महत्वपूर्ण हिस्सा 1857 की क्रांति की शुरुआत को लेकर अंबाला से जुड़े ऐतिहासिक दावे पर आधारित है। आमतौर पर 10 मई 1857 को मेरठ में हुए सैनिक विद्रोह को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआत माना जाता है। हालांकि, अंबाला से जुड़े कुछ दस्तावेजों और शोध के आधार पर यह दावा किया जाता है कि यहां विद्रोह की घटनाएं मेरठ से लगभग नौ घंटे पहले शुरू हो गई थीं।

इसी विषय को ध्यान में रखते हुए म्यूजियम में ‘अंबाला की ओर’ और ‘अंबाला की घटनाएं’ नाम से गैलरियां बनाई गई हैं। इनमें अंबाला छावनी की भूमिका और अंग्रेजी शासन के खिलाफ सैनिकों में बढ़ते असंतोष को दर्शाया गया है।

यह दावा ऐतिहासिक शोध और दस्तावेजों पर आधारित एक व्याख्या है। इसे निर्विवाद ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि कई इतिहासकार आज भी 10 मई 1857 को मेरठ के विद्रोह को क्रांति की शुरुआत मानते हैं।

6. 2012 में सामने आए टेलीग्राम में क्या है खास?

अंबाला में मेरठ से पहले विद्रोह की घटनाओं के दावे के समर्थन में 2012 में सामने आए एक ऐतिहासिक टेलीग्राम का उल्लेख किया जाता है। इसके मुताबिक, 10 मई की सुबह अंबाला में 60वीं और 5वीं नेटिव इन्फेंट्री से जुड़ी विद्रोह की घटनाएं हुई थीं, जबकि मेरठ में उसी दिन शाम को विद्रोह हुआ।

इतिहासकार डॉ. के.सी. यादव की पुस्तक ‘रिवॉल्ट ऑफ 1857 इन हरियाणा’ में भी हरियाणा में हुई क्रांतिकारी गतिविधियों का उल्लेख मिलता है। स्मारक में इन शोधों और दस्तावेजों के आधार पर अंबाला की भूमिका को प्रमुखता दी गई है।

7. रोटी और कमल के फूल से पहुंचते थे गुप्त संदेश

क्रांति की योजना से जुड़ी गैलरी में उस दौर के गुप्त संदेशों और विद्रोह की तैयारियों को दिखाया गया है। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, गांवों तक संदेश पहुंचाने के लिए रोटियों और सैनिक छावनियों में कमल के फूलों का इस्तेमाल संकेत के तौर पर किया जाता था। पेड़ों की छाल के माध्यम से संदेश पहुंचाने का भी उल्लेख मिलता है।

वहीं, ‘क्रांति के कारण’ गैलरी में चर्बी वाले कारतूसों के विवाद को कलाकृतियों और होलोग्राफिक प्रस्तुति के जरिए दिखाया जाएगा।

‘स्वतंत्रता के औजार’ गैलरी में यह बताया गया है कि आजादी की लड़ाई में हथियारों के अलावा साहित्य, कविता, संगीत और जन-आंदोलनों ने भी लोगों को जोड़ने और जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन इतिहासकारों के शोध से तैयार हुई स्मारक की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

अंबाला के शहीदी स्मारक की परिकल्पना और ऐतिहासिक सामग्री जुटाने में कई शोधकर्ताओं और इतिहासकारों का योगदान बताया जाता है।

डॉ. के.सी. यादव: कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से जुड़े रहे डॉ. यादव ने 1977 में अपनी पुस्तक ‘रिवॉल्ट ऑफ 1857 इन हरियाणा’ में हरियाणा की क्रांतिकारी गतिविधियों और अंबाला की भूमिका का उल्लेख किया था।

तेजिंदर सिंह वालिया: अंबाला के इतिहास पर शोध करने वाले वालिया ने ‘हिस्ट्री ऑफ अंबाला’ और 2007 में ‘हरियाणा द टॉर्च बियरर ऑफ 1857’ जैसी पुस्तकें लिखीं। उन्होंने दिल्ली, गुरदासपुर, पटियाला और फिरोजपुर सहित विभिन्न स्थानों से ऐतिहासिक दस्तावेज जुटाए।

डॉ. यू.वी. सिंह: उन्होंने 1994-95 में ‘द रोल ऑफ अंबाला इन फ्रीडम मूवमेंट’ विषय पर शोध किया। स्मारक से जुड़ी रिसर्च टीम में भी उनकी भूमिका बताई जाती है।

सी.बी. सिंह श्योराण: सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर श्योराण ने करीब सात साल तक शोध किया। वर्ष 2019 में उनकी पुस्तक ‘गैलेंट हरियाणा- द फर्स्ट एंड क्रूशियल बैटलफील्ड ऑफ 1857’ प्रकाशित हुई। इसमें रायसीना, घासेड़ा, रूपरका और माऊ सहित हरियाणा के विभिन्न क्षेत्रों में हुए संघर्षों का उल्लेख है।

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